कुछ बातें पराशर गौड़ जी के साथ


Parashar Gaur

पराशर गौड़

दिनांक: ९-अप्रैल,२०११
साक्षात्कारकर्ता: विनय डोभाल | संपादक: जूही डंगवाल

उत्तराखंड में सबसे पहली गढ़वाली फिल्म बनाने का श्रेय श्री पराशर गौड़ जी को जाता है ! आंचलिक फिल्मस के तहत 'जग्वाल' नाम की गढ़वाली फिल्म बनाके गौड़ जी ने न सिर्फ एक इतिहास रचा बल्कि गढ़वाली संस्कृति को देश भर में एक नयी पहचान भी दी ! आज कल गौड़ जी भले ही कनाडा में रहते हैं पर तब भी उनके दिल में अपनी संस्कृति व उत्तराखंड के लिए प्रेम आज भी वैसा ही है ! एक बात जो गौड़ जी की हमेशा याद रहेगी वो है कि "राजनीति तोड़ती है, संस्कृति जोड़ती है" जो कि सही बात है !


अपने बारे में बताएं?

मेरा जन्म उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल में पट्टी असवाल स्यूं के ग्राम मिर्चोड़ा में सन १९४७ को हुआ ! मैं स्वर्गीय पंडित टीकाराम गौड़ व स्वर्गीय मथुरा देवी की ५वी संतान हूँ ! मेरे पिता दिल्ली में जाने माने ज्योतषी थे ! मेरी शुरू की ५ तक की पढाई फले सूला फिर रिठोली में हुई ! ८वी मैंने मंडानेश्वर से की ! आगे की पढाई के लिए पिता जी ने दिल्ली बुला लिया ! माता सुंदरी हायर सेकंडरी में दाखिला भी हो गया था लेकिन अचानक पारिवारिक परिस्थितियों में बदलाव आने के कारण मुझे दिनमे काम करना पड़ा जिसके कारण रात को पढाई करनी पड़ी ! मैंने हाई स्कुल व इंटर मीडियेट व्यक्तिगत की ! बी ए लाला लालपत राय कालेज साहिबाबाद से किया !


आपके द्वारा निर्मित प्रथम गढ़वाली फिल्म 'जग्वाल' के बारे में कुछ बताएं !

जग्वाल कई मायने में मसलन सांस्कृतिक /सामाजिक व अपनी माँ बोली की पहिचान के लिए जद्हो जहद करते उन तमाम पहडियो की कहानी है ! जग्वाल गढ़वाली संस्कृति / रीती रिवाज / बोली - भाषा की एक नुमाय्न्दगी व अगुवाई करने की काहनी है ! जग्वाल एक पारिवारिक कहानी है जिसमें एक परिवार को रिश्तों और रिश्तों को निभाने के लिए संघर्ष करते दिखाया गया है ! यह एक अपराहरिय कारणों के घटित व उसके परिणामों से परिवार को बिखरने व टूटने से बचाने के लिए संघर्ष करती पहाड़ी नारी की कहानी है !


फिल्म 'जग्वाल' बनाने का ख्याल कैसे आया? फिल्म बनने से पहले लोगौं की प्रतिक्रिया क्या थी ?

जग्वाल बनाने से पहले मैं सन ६० से ८० तक गढ़वाली रंगमंच से बतौर लेखक / कलाकार / निर्देशक व संस्थापक के रूप में जुड़ा हुआ था ! मैंने गढ़वाली व हिंदी के ५० से ऊपर नाटक किये ! मैं उस दौरान के गढ़वाली रंगमंच का चर्चित कलाकारों में से एक था ! सन ७० के दशक में मेरा चुनाव बतौर एक कलाकार के रूप में एन.एस.डी के लिए भी लगभग हो चुका था लेकिन मै गया नही ! मैंने तब ये निर्णय ले लिया था की अब मै आंचलिक ( गढ़वाली ) के लिए ही काम करूंगा ! मंच पर अभिनय करते करते मैंने तब सोचा की क्यूँ न अपनी माँ बोली में फिल्म बनाई जाय ! काम बड़ा कठिन था लेकिन मेरी निष्ठा और मेरा लक्ष्य साफ़ था ! सन ७२ में मैंने हिमांशु जोशी की कहानी " कगार की आग" जो साप्ताहिक हिन्दोश्तान में छपी थी पड़ी ! वो कहानी पहाड़ी परावेस के हिसाब से बिलकुल सटीक थी जो मुझे पसन्द थी और है ! मैं हिमांशु जी को तब नही जानता था ! मैंने अपने मित्र राजेंद्र धस्माना जी से सादी बात कही तो उन्होंने मुझे हिमांशु जी से मिलवाया ! जब मैंने उनसे गढ़वाली में फिल्म बनाने की बात करते हुए उनकी कहानी लेने की बात कही तो वे पहले तो मुझे ऊपर से पाऊ तक एक बड़ी अजीब सी निगाहों से देखने लगे ! उनके उस अंदाज से मैं उनका तात्पर्य समझ गया था की फिल्म और ये ? ये क्या फिल्म बनायेंगे ! बात आई गई हो गई ! रात भर सोचता रहा ! सुबह जब उठा तो मैंने स्वयं से कहा क्यूँ न मैं स्वयं कोई काहनी लिखू ! इस तरह जग्वाल की शुरुवात हुई !

जग्वाल के शुरू होने से और बनने तक लोगों की प्रतिक्रिया के बारे में न पूछे तो अच्हा होगा क्यूंकि किसी ने भी मुझे तब ना तो हौसाल दिया ना ही शाबासी ! हाँ समाज में मैं एक हंसी का पात्र जरुर बना या बनाया गया ! मेरे मान सम्मान को कई बार दांव पर लगना पड़ा ! जैसे ही लोगों ने सुना कि मैं फिल्म बनाने जा रहा हूँ बस उसी दिन से मेरे साथियों से लेकर जान पहिचान वाले मुझ पर ये व्यंग कसते नही थकते थे " लो , आ गया गढ़वाली फिल्म प्रोड्यूसर !

मुझे मेरे ही नाटक के साथियों ने मेरा मंच व व्यक्तिगत रूप से बहिस्कार करना शुरू कर दिया ! सब ने एक स्वर में कहना शुरू कर दिया की हम इसके साथ नाटक नहीं करंगे ! नाटक के लेखक व नाटक करवाने वाली संस्थाएं मुझे लेना चाहती थी क्यूंकि तब एक अच्छा कलाकार के रूप में मेरा नाम हो चुका था लेकिन वे उनके आगे क्या करते !

६ साल के बाद आखिर मेरे एक मित्र श्री मोहन डंडरियाल जी, जिनके साथ मैं कई नाटक कर चुका था, ने मुझे उन लोगों कि नाराजगी के बाबजूद एक नाटक में लिया ! नाटक का नाम था " किस्सा कुर्सी का " मैंने उसमे काम किया, पेपर रिव्यू आये, सबने मेरे अभिनय की तारीफ़ लिखी थी इस तरह मेरा वनवास समाप्त हुआ जो उनके लिए एक तमाचा था ! प्रतिक्रिया पर एक पूरा उपन्यास लिखा जा सकता है उसके बारे में फिर कभी बात करेंगे !


जब फिल्म 'जग्वाल' बन के सामने आयी तब लोगों की प्रतिक्रिया कैसी थी?

सन १९८३ की वो शाम जब मबलान्कार हॉल, रफ़ी मार्ग पर जिस दिन जग्वाल का प्रीमियर शो था उस दिन लग रहा था पूरा पहाड़, पहाड़ से यहाँ चला आया हो ! भीड़ को काबू करने के लिए पुलिस का बन्दोबस्त करना पड़ा था ! उसी भीड़ में मैंने स्वयं उन लोगो को लाइन में खड़े देखा जो मुझ पर फबतियां कसा करते थे ! मैं स्वयम उनके पास गया और उन्हें अपने साथ बड़े आदर के साथ अन्दर लेकर गया ! मेरे इस व्यवहार से वो पानी पानी तो थे लेकिन असल में वो ही मेरे असली शुभ चिंतक भी थे जिन्होने मुझे बार बार ताने मार मार कर मुझे आगे बड़ने की हिम्मत दी ! मै तो उन सब का ऋणी हूँ !

दूसरे दिन तो सचमुच पहाड़ के साथ साथ पूरा हिन्दोस्तान भी जान चुका था की गढ़वाली बोली भी कोई बोली है !


Parashar Gaur With Indira Gandhi ji

आपके नजर में गढ़वाली फिल्म जगत का भविष्य क्या और कैसा है? क्या इस और प्रयास की जरुरत है?

जहाँ तक गढ़वाली फिल्मों की बात है तो उसका भविष्य तो शुरू से था ही नहीं, कारण जग्वाल कि देखा देखी कुछ लोगों ने प्रयास तो जरुर किया लेकिन फिल्म के नज़रिये से नहीं अपितु केवल, बस केवल उनका उद्देश्य था की वे भी इस दौड़ में सामिल हो जाए बतौर एक निर्माता के रूप में ! जितनी भी फिल्में आई उनका सारा ताना बाना तो मुम्बैया था पहाड़ व पहाड़ की बात तो उनमें थी ही नहीं ! तो फिर उन्हें स्वीकारता कौन ? "घर जवाई" के बाद उत्तराखंडी फिल्में भी पहाड़ की ना होकर मुंबई की "घर जवाई" बनकर रह गई ! पहाड़ तो कब का छूट चुका है ! और जब कोई घर जवाई हो जाता है तो उसका ना तो घर में सम्मान होता है और न ही ससुराल में ! यही हाल हुआ हमरी पहाड़ी फिल्मों का !

जहाँ तक इसके भविष्य की बात है तो उसके लिए प्रयास किये जा सकते है ! निर्माता केवल निर्माता तक ही रहें ! वो फिल्मों में सब कुछ ना बने ! अपने व्यक्तिगत इगो को दर किनारे कर एक टीम बनाए जिसमें पहाड़ के चुनिंदे व्यक्ति को लें जो की अपने छेत्र के जानकार हो ! सरकार को भी चाहिए की वो इस की मदद के लिए आगे आये !


'जग्वाल' के अलावा कोई और फिल्म जिसको आपने निर्देशित किया हो?

जग्वाल के बाद मैंने 'ध्यय' बनाई थी जो की डिब्बो में बंद है ! अब जब जाऊंगा फिर निकालने का प्रयास करूंगा ! उत्तराखंडी फिल्मों के २५ साल पुरे होने के उपलक्ष पर फिल्म "गौरा " बनाइ ! गौरा डिजिटल फिल्म है जो पहाड़ी राजनीती पर एक व्यंग है और जिसे मीडिया ने उत्तराखंड की पहली राजनैतिक फिल्म कह कर सराहा ! ये पहाड़ की पहली फिल्म है जिसे वोमेन फिल्म फेस्टिवल में सम्मलित किया गया !


Parashar Gaur With Giani Zail Singh ji

गढ़वाली साहित्य के बारे में कुछ शब्द

साहित्य की तो कई बिधाये है ! जिनमें गध्य , पद्य मुख्य है ! गढ़वाली में वैसे तो कविता बहुत लिखी जा चुकी है ! बहुत सारी किताबें भी छप चुकी है ! मेरे पास यहाँ कनाडा में लगभग १०० किताबें हैं लेकिन लेख, मेरे कहने का तात्पर्य गध्य से है ! गध्य में बहुत कम लिखा गया है ! असल में भाषा का जो रूप स्वरुप निखारता है या बनाता है तो वो गध्य है ! और जब गध्य ही नहीं होगा तो भाषा कहा से बनेगी ! जब भाषा ही नहीं होगी तो साहित्य की बात करना बेकार की बात है ! दुःख इसी बात का है की हमारे यहाँ ना ही ज्यादा कहानियां, ना ही नाबल, न ही लेख आदि लिखे गए है और न ही ज्यादा लेखक हैं ! जब तक हम इस ओर ध्यान नहीं देँगे तो साहित्य बनेगा ही नही और न ही होगा !


कुछ शब्द अपने प्रशंषको के लिए

इतना ही कहूंगा लक्ष्य साधे, सपने देखे और उन्हें साकार करें !


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